भारतीय लोगों की अहिंसक और गैर आक्रामक छवि के चलते हिंसा के आसान लक्षय बन रहे हैं हिन्दुस्तानी विद्यार्थी. अहिंसक होना विदेश में एक विफल नीति है. कोई भी ना तो हिन्दुस्तानी नागरिकों को और ना ही भारतीय सरकार को गंभीरता से लेता है. कल ही दो चार ऑस्ट्रेलियन लोगों के जबडे तोड दो, देखना कैसे लाइन पर आते हैं सभी. अगर आपको मार खाने से हरज़ नहीं तो टिका कर दो चार लगाने से परहेज़ क्यों? अगर भारत सरकार को सेना के सज-ओ-समान के लिये अरबों रुपये खरचने पर संकोच नहीं तो खुद हथ्यार बना कर विदेशों में बेचने में हरज़ क्यों? यह दोहरे मापदंड आपकी कौन सी व्यक्तिगत या राष्ट्रीय नीति का हिस्सा हैं?
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