miércoles, 1 de enero de 2014

धर्म निरपेक्षता और "आम आदमी पार्टी"

धरम-निरपेक्ष कोई नहीं हो सकता, हो जाने का दवा कर सकता है किन्तु ऑलमोस्ट असंभव है. 

इस शबद को खतम कर दो और कोई और नया शबद ढूंडो जो ज़्यादा स्टेक हो. 

वैसे मेरे कारोबर में मेरे पास सभी धरम के लोग आते हैं लेकिन वो तो मेरे कस्टमर हैं. अगर में धरम निरपेक्षता के नाम पर किसी खास वरग को स्पेशल डिसकाउंट देना शुरु कर डून तो क्या में क्ष्- निरपेक्षता के सर्टिफिकेट का हक़दार हो जयूंगा? 

कोई मजबूरी की वजह से सभी को ब्राबर समझने का नाटक कर सकता है. 

मेरे हिसाब से में उत्तम हून, मेरा परिवार, मेरा समाज, मेरा धरम, मेरा देश उत्तम है और तुम्हारा सब कुछ बेकार, गंदा घटिया. तो क्या में निरपेक्ष हो सकता हून? क्या में भिखारी को साथ में बिठाकर खाना खिला सकता हून? 

नहीं, तो अपनों के अपेक्षा तो खून में है, कमल फ़ारूक़ी हो या प्रदीप कुमार, एक ईगो है जो सबमें कूट कूट कर भरी हुई है. 

आप को अपने जन-आधार को बढाना है, यह लक्ष्य है इसलिये उसको क्लियर कर देना चाहिये के धरम निरपेक्षता के बारे में उनकी क्या राय है?



अपेक्षा का जनम और निरपेक्षता का अंतिम संस्कार तो उसी समय हो जाता है जब हम किसी को मुस्करा कर नमस्ते ही कह देते हैं.

 यदि यह सत्य है तो निरपेक्षता के नाम पर भारतीय राजनीति में इतने बड़े बड़े ड्रामे क्यों? 

इतना सब लिखने के बाद में अपेक्षा करता हून के आप मुस्करा रहे होंगे. 

निरपेक्षता की उदाहरण दे रहा हून. 

साक्षात्कर्ता ने उम्मीदवार से कहा, "तुम अपनी सबसे बड़ी कमज़ोरी बताओ": 

उम्मीदवार :- "सत्य बोलना और ईमानदारी मेरी सब से बड़ी कमज़ोरी है". 

साक्षात्कर्ता: "यह तुम्हारी कमज़ोरी नहीं, ताक़त है". 

उम्मीदवार का निरपेक्ष जवाब: - "अबे बूढ़े खूँसत, तू जो मर्ज़ी कहता रहे, मुझे फरक नही पड़ता, मुझे मालूम है के यह मेरी कमज़ोरी है".




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